
धनबाद : कोयलांचल की राजनीति में शनिवार की रात एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनी। तमाम सियासी कयासों और बड़े राजनीतिक दलों की घेराबंदी को दरकिनार करते हुए, पूर्व विधायक संजीव सिंह ने धनबाद नगर निगम के मेयर पद पर एकतरफा जीत हासिल की है। जेल की सलाखों से बाहर आने के महज कुछ महीनों के भीतर मिली इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि धनबाद की सियासत में आज भी ‘सिंह मेंशन’ का सिक्का चलता है।
संजीव सिंह ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि धनबाद नगर निगम के इतिहास के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। उन्हें कुल 1,14,362 वोट मिले। यह पहली बार है जब धनबाद में किसी प्रत्याशी ने एक लाख का आंकड़ा पार किया है। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चंद्रशेखर अग्रवाल को 31,902 मतों के विशाल अंतर से हराया।
झामुमो समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल (82,460 वोट) दूसरे और कांग्रेस के शमशेर आलम (59,079 वोट) तीसरे स्थान पर रहे। सबसे बड़ी गिरावट भाजपा समर्थित संजीव कुमार (57,895 वोट) की रही, जो चौथे स्थान पर खिसक गए।
भाजपा ने इस चुनाव में सांसद ढुलू महतो और स्थानीय विधायकों की पूरी फौज उतार दी थी, लेकिन संजीव सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अकेले ही सबको मात दी। उनकी जीत के पीछे माना जा रहा है कि नीरज सिंह हत्याकांड में बरी होने के बाद जनता ने उन्हें ‘साजिश का शिकार’ माना। साथ ही निर्दलीय होने के बावजूद उन्होंने भाजपा के कोर वोटरों को अपनी ओर खींच लिया। सभी दलों का एकजुट होकर संजीव पर हमला करना उनके लिए ‘अकेले योद्धा’ की छवि बनाने में मददगार साबित हुआ।
संजीव सिंह का यह सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 2017 में नीरज सिंह हत्याकांड के आरोप में जेल जाने के बाद उन्होंने 8 साल सलाखों के पीछे बिताए। अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ हत्या की साजिश का कोई भी ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा। अगस्त 2025 में कोर्ट द्वारा ‘साक्ष्यों के अभाव’ में बरी किए जाने के बाद वे बाहर आए। जेल से बाहर आने के ठीक बाद इस बड़ी जीत ने उनके राजनीतिक करियर को नई दिशा दी है।
सूर्यदेव सिंह की विरासत और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानियों से चर्चा में रहने वाले इस परिवार ने अब यह साबित कर दिया है कि उनका प्रभाव केवल झरिया तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे धनबाद में है। संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह झरिया से भाजपा विधायक हैं।
संजीव सिंह की इस जीत ने झारखंड की आगामी विधानसभा राजनीति के समीकरण भी बदल दिए हैं। अब देखना यह होगा कि मेयर के रूप में वे कोयलांचल की समस्याओं का कैसे, कितना और क्या समाधान करते हैं।