
पटना : बिहार की राजधानी में एक ऐसा विवाह संपन्न हुआ जो रूढ़िवादिता पर कड़ा प्रहार और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक बन गया। 27 फरवरी की रात, दरभंगा के अनंत कुमार (अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी) और नालंदा की शिखा (प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी) ने पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों को त्यागकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हुए जीवनभर साथ निभाने का संकल्प लिया।
अनंत और शिखा 67 वीं बीपीएससी परीक्षा के चयनित अधिकारी हैं। दोनों ने अपने वैवाहिक गठबंधन के लिए किसी धार्मिक कर्मकांड के बजाय ‘अर्जक पद्धति’ को चुना।
- संविधान ही साक्षी : मैरिज हॉल में अग्नि के फेरों की जगह उनके हाथों में संविधान की प्रस्तावना थी।
- समझ और समर्पण : दुल्हन शिखा का कहना है कि मंत्रों का अर्थ अक्सर समझ में नहीं आता, लेकिन संविधान के शब्दों को वे दिल से महसूस और स्वीकार कर रही थीं।
दूल्हे अनंत कुमार की पृष्ठभूमि बेहद मेधावी रही है। IIT रुड़की से 2017 में इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उन्हें 1.5 करोड़ रुपये के पैकेज पर निजी कंपनी में नौकरी मिली थी। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में भी काम किया, लेकिन समाज सेवा के जुनून में यूपीएससी की तैयारी की और अंततः बीपीएससी के माध्यम से अधिकारी बने।
दोनों अधिकारियों का मानना है कि आज वे जिस मुकाम पर हैं, वह बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित संविधान की ही देन है। शिखा के अनुसार, ओबीसी समाज से आने के कारण उनके पूर्वजों ने कई बाधाएं झेलीं। संविधान ने ही उन्हें बराबरी का अधिकार और अवसर दिया।
अनंत ने बताया कि उन्होंने इस पद्धति को इसलिए चुना क्योंकि यह समाज को जकड़ने वाली परंपराओं से मुक्त कर समानता का संदेश देती है।
शिखा की मां गीता देवी (पूर्व जिला परिषद सदस्य) और उनके परिवार ने इस फैसले का पूरा समर्थन किया। पटना में रहने के दौरान बौद्ध विचारधारा के संपर्क में आने के बाद इस परिवार ने पारंपरिक पूजा-पाठ के स्थान पर संवैधानिक और सामाजिक मूल्यों को जीवन का आधार बना लिया है।
अनंत और शिखा का यह कदम उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो विवाह को केवल एक निजी आयोजन न मानकर सामाजिक संदेश का जरिया बनाना चाहते हैं।
सात फेरों और सात वचनों और मंत्रोच्चार की जगह ‘संवैधानिक’ वचन लेने वाले इस जोड़े की अनोखी शादी इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।