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विशद कुमार

रांची : 20वें मनरेगा दिवस के अवसर पर 2 फरवरी को झारखंड की राजधानी रांची के नामकुम में सैकड़ों मनरेगा मज़दूरों, कार्यकर्ताओं और ग्रामीण परिवारों ने मज़दूर महापंचायत एवं रैली आयोजित की। यह आयोजन MGNREGA बचाओ मोर्चा एवं NREGA वॉच के संयुक्त बैनर तले हुआ, जिसमें झारखंड के तमाम किसान-मज़दूर संगठनों की भागीदारी रही। सबने एक स्वर में VB-GRAMG को नकारा और MGNREGA को फिर से लागू करने की मांग की।

दोपहर 1 बजे मज़दूरों ने नामकुम चौक से रैली निकालकर पुराना प्रखण्ड परिसर तक मार्च किया, जहां  शाम 4 बजे तक मज़दूर महापंचायत आयोजित की गई। कार्यक्रम में राज्य के सिमडेगा, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, लोहरदगा, लातेहार, पलामू, गुमला और रांची से आए सैकड़ों मनरेगा मज़दूर, कार्यकर्ता और ग्रामीण परिवार शामिल हुए। महापंचायत का संचालन अफ़ज़ल अनीस ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में झारखण्ड नरेगा वॉच के संयोजक जेम्स हेरेंज ने याद दिलाया कि “2005 में दशकों के जन संघर्षों के बाद संसद ने सर्वसम्मति से मनरेगा कानून पारित किया, जिसे 2 फ़रवरी 2006 को लागू किया गया। इस कानून ने ग्रामीण भारत को काम का अधिकार, महिलाओं को रोज़गार, मज़दूरी में समानता और गांवों में टिकाऊ परिसंपत्तियां दीं।” उन्होंने VB-GRAMG की खामियों को सबके सामने रखा।

इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि “2006 में काम और जॉब कार्ड की मांग को लेकर लोग जेल तक गए थे। इस संघर्ष के बाद राज्य में लोगों को मनरेगा से काम, कुआं और आम बगीचा मिला। लेकिन मोदी सरकार ने इसे ख़त्म कर दिया। आरएसएस ने 78 साल पहले महात्मा गांधी को मारा और अब मोदी सरकार महात्मा गांधी के नाम तक को मिटा रही है।”

सभा में वाराणसी के अरविंद मूर्ति ने कहा – “आजादी के लगभग 50 साल बाद काम का अधिकार एक मौलिक अधिकार बना था। मौजूदा मज़दूर-विरोधी सत्ता ने ग्रामीण भारत की आजीविका पर हमला किया है। यह केवल रोज़गार पर नहीं, बल्कि संविधान पर हमला है।”

 झारखण्ड जनाधिकार महासभा के सिराज ने कहा कि “मनरेगा एक सार्वभौमिक और मांग-आधारित कानून था, जो देश के हर ग्रामीण क्षेत्र में लागू होता था।”

 उन्होंने कहा कि “अब दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार तय करेगी कि आपके गांव में कौन सा काम होगा? या काम होगा भी या नहीं। गांव-गांव में मनरेगा खत्म किया जा रहा है। इसकी सच्चाई जनता तक पहुंचानी होगी। हर गांव, प्रखण्ड और ज़िला स्तर पर इसके ख़िलाफ़ संगठित विरोध खड़ा करना होगा।”

सोनुआ की मनरेगा मज़दूर बसंती देवी ने बताया कि “2015 से मनरेगा में काम कर उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा संभाली।”

कौशल्या देवी ने कहा कि “मनरेगा ने पहली बार पुरुषों और महिलाओं की मज़दूरी बराबर करने की गंभीर कोशिश की।”

 गारू के घुटारी सिंह ने सवाल उठाया कि “बीस साल में 100 दिन का काम भी नहीं मिला। पारदर्शिता नहीं है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। VB-GRAMG इससे क्या समाधान देगा?”

मनिका की बबीता देवी ने कहा कि “मनरेगा खत्म होने पर परिवारों को मजबूरी में पलायन करना पड़ेगा और शहरों में बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी।”

 श्यामा सिंह ने कहा कि “मनरेगा कानून लंबी लड़ाई से मिला था। नए कानून में खेती के मौसम के दौरान साल में 60 दिन काम बंद रखने का प्रावधान है।”

उन्होंने सवाल उठाया कि “अकाल या बाढ़ की स्थिति में मज़दूर कैसे जिएगा?”

आदिवासी अधिकार मंच के प्रफुल लिंडा ने कहा कि “कई फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्टों में गलत भुगतान, लीकेज, लंबित मज़दूरी और सामग्री भुगतान सामने आए हैं, जिनसे दिहाड़ी पर निर्भर मज़दूर हताश होकर मनरेगा से दूर हुए। अब राज्यों पर बजट का अतिरिक्त बोझ डालकर काम के अधिकार को और कमजोर किया जा रहा है। नए 60:40 नियम के तहत यदि मज़दूरी 100 रुपये है तो 40 रुपये राज्य सरकार को देने होंगे। गरीब राज्यों के लिए यह संभव नहीं है, जिसका सीधा अर्थ है काम का ठप होना।”

महापंचायत में VB-GRAMG के विरोध और मनरेगा बहाली का प्रस्ताव पारित किया गया और यह संकल्प लिया गया कि यह एक लंबी लड़ाई की नई शुरुआत है और मनरेगा कानून की पूर्ण बहाली तक संघर्ष जारी रहेगा।

 कार्यक्रम में बताया गया कि राष्ट्रपति के नाम इस प्रस्ताव को भेजा गया है। कार्यक्रम के दौरान हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री दिल्ली को भेजा जाएगा।

सभा को झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, मनरेगा आंदोलन के स्तंभ बलराम, सीटू के शिव कुमार राय ने सम्बोधित किया। इनके अलावा शनियारो देवी,  वीणा लिंडा, अम्बिका यादव, संदीप प्रधान, मुन्नी देवी, बसंती देवी, कौशल्या देवी, जयंती तिर्की, धूतरी सिंह, कविता देवी आदि ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में आदिवासी अधिकार मंच, ग्राम स्वरज्य मज़दूर संघ, स्वाभिमानी मज़दूर संगठन, झारखण्ड जनाधिकार महासभा, डैम प्रभावित संघर्ष समिति, कर्रा, झारखण्ड किसान परिषद्, चांडिल आदि संगठन भी शामिल थे।

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