रांची : झारखंड को उसकी पहचान और नाम देने वाले शिखर पुरुष, प्रखर राजनीतिज्ञ और महान साहित्यकार स्व. लाल रणविजय नाथ शाहदेव की जयंती गुरुवार को राजधानी रांची में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालयके सभागार में आयोजित इस गरिमामय समारोह में राज्य भर के दिग्गज साहित्यकार, कलाकार और शिक्षाविदों का जमावड़ा लगा।
समारोह के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि राज्य का नाम ‘झारखंड’ सुनिश्चित करने में शाहदेव जी की भूमिका निर्णायक थी। कुलपति डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने कहा, शाहदेव जी का सबसे बड़ा अवदान इस राज्य का नामकरण है। उनके जीवन और संघर्षों पर विश्वविद्यालयों में और अधिक शोध होना चाहिए। पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख ने भावुक होते हुए कहा कि शाहदेव जी के गीतों ने शोषण के विरुद्ध जन-आंदोलन को ऊर्जा दी।
कार्यक्रम में उनके विराट व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। 5 फरवरी 1940, पालकोट राजघराना में जन्मे शाहदेव जी ने राजनीति शास्त्र, इतिहास और विधि (LLB) में उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1968 के आंदोलन और 1975 के जेपी आंदोलन में मीसा के तहत जेल यात्रा की। इसके अतिरिक्त ‘पूजा कर फूल’, ‘जागी जवानी चमकी बिजुरी’ और ‘नागपुरी भगवद्गीता’ समेत लगभग 400 कालजयी रचनाएं भी साहित्य जगत को दी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक भूमिका झारखंड विधेयक का प्रारूप तैयार करने और ‘झारखंड’ नाम की स्वीकृति दिलाने में रही।
पद्मश्री महाबीर नायक और पद्मश्री मुकुंद नायक ने उनके सांस्कृतिक योगदान को याद करते हुए बताया कि कैसे ‘नागपुरी कला संगम’ के माध्यम से उन्होंने लोक कलाकारों को एक वैश्विक मंच प्रदान किया। विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नंद तिवारी ने उनकी कृति ‘नागपुरी भगवद्गीता’ को भाषाई पांडित्य का अनूठा प्रमाण बताया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर डॉ. शकुंतला मिश्र, डॉ. देवशरण भगत, प्रवीण प्रभाकर, डॉ. अजय नाथ शाहदेव, ऋतुराज शाहदेव सहित कई गणमान्य लोग, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।