अमीरों को सब्सिडी देना गलत, देश को आत्मनिर्भर बनाएं, निर्भर नहीं : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी लाभ के लिए ‘मुफ्त की रेवड़ियां और नकद राशि बांटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बिना विजन के पैसा बांटना देश की कार्य-संस्कृति और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए घातक है।
CJI सूर्यकांत ने ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर’ (नकद हस्तांतरण) योजनाओं के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि यदि सरकारों से बिना मेहनत के पैसा मिलता रहेगा, तो क्या भविष्य में लोग काम करना चाहेंगे? पीठ ने चिंता जताई कि इस तरह की योजनाएं राष्ट्र की मेहनत करने की मूल भावना और कार्यक्षमता को नष्ट कर सकती हैं। अदालत ने ‘जरूरतमंद की मदद’ और ‘वोट बैंक की राजनीति’ के बीच का अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने बिजली बिल माफी का उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग बिल भरने में सक्षम हैं और जो गरीबी रेखा के नीचे हैं, उनके बीच अंतर होना चाहिए। संपन्न लोगों को मुफ्त सुविधाएं देना तुष्टिकरण है।
कोर्ट ने दुख व्यक्त किया कि राज्य सरकारें बुनियादी ढांचे पर निवेश करने के बजाय भोजन, कपड़े और नकदी बांटने को प्राथमिकता दे रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्यों द्वारा घोषित भारी-भरकम योजनाओं के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हैं:
| राज्य | योजना का नाम | दी जा रही राहत/नकदी |
| तमिलनाडु | कलाईग्नार मगलिर उरीमई थिट्टम | 1.3 करोड़ महिलाओं को ₹5,000 अग्रिम |
| पश्चिम बंगाल | लक्ष्मी भंडार योजना | महिलाओं की मासिक राशि में भारी वृद्धि |
| असम | बिहू गिफ्ट | एकमुश्त ₹8,000 की नकद सहायता |
| केरल | स्त्री सुरक्षा योजना | नकद वित्तीय सहायता का प्रावधान |
कोर्ट ने राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की चेतावनी दी। सरकार का लक्ष्य व्यक्तियों को रोजगार के माध्यम से सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि उन्हें सरकारी मदद पर निर्भर बनाना। सीजेआई ने अंत में कहा, “हमें यह देखकर परेशानी होती है कि विकास के बजाय चुनाव के समय चीजें बांटी जा रही हैं। यह राष्ट्र के भविष्य के लिए निवेश नहीं, बल्कि बर्बादी है।”