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मध्य पूर्व से आ रही सनसनीखेज खबरों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इजरायल और अमेरिका के भीषण हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई  के मारे जाने की सूचना है। इस एक घटना ने न केवल ईरान की आंतरिक राजनीति को हिला दिया है, बल्कि पिछले 47 वर्षों से चला आ रहा इस्लामिक शासन भी अब समाप्ति की कगार पर पहुंच गया है।

खामेनेई के युग के अंत के साथ ही ईरान में सत्ता के नए समीकरणों की सुगबुगाहट तेज हो गई है। अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे ईरान के क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के अब देश की कमान संभालने के कयास लगाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि ईरान में अब एक ऐसी सरकार बनने की संभावना है जिसे अमेरिका का सीधा समर्थन प्राप्त होगा।

ईरान अब तक इस क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल विरोधी ताकतों का मुख्य केंद्र रहा है, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल सकती है। ईरान के सीधे संरक्षण में फलने-फूलने वाले संगठन- हमास, हूती और हिजबुल्लाह – अब नेतृत्व और संसाधनों के अभाव में कमजोर पड़ सकते हैं।  ईरान ने इन संगठनों के जरिए यमन, लेबनान और फिलिस्तीन पर अपना परोक्ष नियंत्रण बना रखा था, जिसका वर्चस्व अब समाप्त होना तय माना जा रहा है। मिडल ईस्ट के राजनीतिक भूगोल में यह बदलाव इजरायल के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।

 इजरायल के लिए लंबे समय से सिरदर्द बने इन उग्रवादी संगठनों के कमजोर होने से उसकी सुरक्षा स्थिति मजबूत होगी। ईरान में शासन परिवर्तन के बाद इजरायल इस क्षेत्र में एक निर्विवाद ‘सुपर पावर’ के रूप में उभर सकता है।

ईरान अब तक सुन्नी बहुल देशों (जैसे सऊदी अरब और तुर्की) के मुकाबले शिया इस्लाम  की मजबूती से नुमाइंदगी करता रहा है। हालांकि, शासन बदलने से यह धार्मिक और राजनीतिक संतुलन पूरी तरह प्रभावित होगा, जिससे पूरे क्षेत्र के समीकरण बदल जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में यह शासन परिवर्तन केवल एक देश की आंतरिक घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे मिडल ईस्ट के भविष्य को एक नई दिशा देगा।

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