प्रयागराज: हाल के दिनों में न्यायपालिका का रुख सामाजिक और व्यक्तिगत संबंधों की जटिलताओं को लेकर काफी व्यावहारिक हुआ है। केरल हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणियों के बाद, अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सहमति से बने संबंधों और ‘शादी के वादे’ को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी लकीर खींची है। जहां केरल के हाई कोर्ट ने कहा था कि अविवाहित पुरुष के कई महिलाओं के साथ सहमति से यौन संबंध बनाने में क्या गलत है, वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी का वादा कर दुष्‍कर्म से जुड़े एक मामले में अपना अहम फैसला सुनाया है जिसमें अदालत ने कहा है कि दो बालिगों के बीच सहमति से लंबे समय तक चलने वाले संबंध को, यदि बाद में विवाह का वादा पूरा नहीं होता है, तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस संबंध में न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने ट्रायल कोर्ट में चल रही एक मुकदमे की कार्यवाही को रद्द कर दिया।

अलीगढ़ के गांधी पार्क थाने का यह मामला साल 2014 से 2021 के बीच का है। एक युवती ने जितेंद्र कुमार नामक युवक पर आरोप लगाया था कि उसने शादी का झूठा वादा करके 7 साल तक शारीरिक संबंध बनाए। उसका गर्भपात कराया और आरोपी के परिजनों ने उसे धमकी दी।

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को रद्द करते हुए कुछ कड़े और स्पष्ट बिंदु रखे जिसमें कहा गया कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहते हैं, तो केवल शादी न हो पाने की स्थिति में इसे ‘दुष्कर्म’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि बालिगों के बीच स्वेच्छा से बनाए गए संबंधों को बाद में अपराध की श्रेणी में डालना कानून का दुरुपयोग हो सकता है।

आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि दोनों के बीच पढ़ाई के समय से प्रेम संबंध थे। साथ ही, यह भी आरोप लगाया गया कि पीड़िता ने 10 लाख रुपये की मांग पूरी न होने पर FIR दर्ज कराई थी। वहीं, लड़की के वकील ने कहा कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाए थे।

न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि वादा टूटना हमेशा धोखाधड़ी या दुष्कर्म नहीं होता, जबकि निजी रंजिश या पैसे की मांग के लिए कानून का इस्तेमाल करना गलत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *