पटना : बिहार विधान परिषद की कार्यवाही के दौरान उस समय हंसी के फव्वारे छूट पड़े, जब चर्चा का विषय तो डिजिटल शिक्षा था, लेकिन बीजेपी एमएलसी नवल किशोर यादव के एक चुटीले कटाक्ष ने गंभीर बहस को मनोरंजक बना दिया। उन्होंने आधुनिक दौर की डिजिटल निर्भरता पर तंज कसते हुए कहा, “जिस रफ्तार से सब कुछ ऑनलाइन हो रहा है, लगता है अब बच्चे भी डिजिटल ही पैदा होंगे।”

डिजिटल व्यवस्था की कमियों और इसकी अति पर चर्चा करते हुए नवल किशोर यादव ने अपने खास अंदाज में बात रखी। उन्होंने कहा कि आज एडमिशन से लेकर परीक्षा तक, सब कुछ कंप्यूटर और मोबाइल पर सिमट गया है। छात्र हर वक्त गैजेट्स से घिरे रहते हैं। इसी संदर्भ में उनका ‘डिजिटल बच्चे’ वाला बयान आया, जिससे सदन का माहौल कुछ देर के लिए काफी हल्का हो गया। हंसी-मजाक के बीच उन्होंने यह संदेश भी दिया कि कहीं हम मानवीय संवेदनाओं और धरातल की हकीकत को भूलकर पूरी तरह मशीन पर ही निर्भर तो नहीं होते जा रहे हैं।

मजाक से हटकर एमएलसी ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। उन्होंने मांग की कि विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परीक्षा आयोजित करने और परिणाम घोषित करने की एक ‘डेडलाइन’ तय होनी चाहिए।  यादव ने सवाल उठाया कि जब नामांकन और फॉर्म भरने की प्रक्रिया डिजिटल है, तो परीक्षा परिणामों में महीनों की देरी क्यों होती है? उन्होंने डिजिटल मूल्यांकन को और अधिक पारदर्शी और तीव्र बनाने पर जोर दिया ताकि छात्रों का कीमती समय बर्बाद न हो।

नवल किशोर यादव ने कहा कि डिजिटल प्रणाली लागू करने का असली मकसद छात्रों को सुविधा देना होना चाहिए। वर्तमान में कई बार सर्वर डाउन होने या तकनीकी खामियों के कारण छात्र घंटों परेशान रहते हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि केवल कागजों पर डिजिटल होने के बजाय जमीन पर बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए।

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