नए कानून के अनुसार, पति अपनी पत्नी की पिटाई कर सकता है, बशर्ते उससे महिला की हड्डी न टूटेया कोई गहरा घाव न हो ‘

सहारनपुर : मशहूर देवबंदी उलेमा और ‘जमीयत दावातुल मुस्लिमीन’ के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार द्वारा महिलाओं के खिलाफ जारी किए गए नए और विवादित कानून पर कड़ा ऐतराज जताया है। तालिबान के इस फरमान, जिसमें घरेलू हिंसा को शर्तों के साथ एक तरह से ‘वैध’ कर दिया गया है, को मौलाना ने इस्लाम की मूल रूह के खिलाफ बताया है।

अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने घरेलू हिंसा को लेकर एक अजीबो-गरीब कानून पेश किया है। कानून के अनुसार, पति अपनी पत्नी की पिटाई कर सकता है, बशर्ते उससे महिला की ‘हड्डी न टूटे’ या कोई गहरा घाव न हो। यदि पिटाई के दौरान हड्डी टूटती भी है, तो दोषी पति को अधिकतम केवल 15 दिन की जेल का प्रावधान रखा गया है। इस कानून को पूरी दुनिया में मानवाधिकारों और विशेषकर महिलाओं की गरिमा के खिलाफ माना जा रहा है।

देवबंदी उलेमा ने तालिबान की इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी बर्बरता का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। मौलाना ने स्पष्ट किया कि इस्लाम इंसाफ, इज्जत और रहम का मजहब है। शरीअत में किसी भी प्रकार की ज्यादती या हिंसा को जायज नहीं ठहराया गया है। हदीस-ए-नबवी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पैगम्बर मोहम्मद ने महिलाओं के साथ बेहतरीन सुलूक की ताकीद की है और उन्हें अल्लाह की अमानत बताया है।

मौलाना ने जोर देकर कहा कि जो लोग ताकत और जबरदस्ती को दीन का हिस्सा बताते हैं, वे दरअसल इस्लाम की सही समझ से नावाकिफ हैं। मौलाना गोरा ने चिंता जताई कि कुछ संगठनों के गलत फैसलों की वजह से पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि धुंधली होती है। उन्होंने दुनिया भर के उलेमा और जिम्मेदार लोगों से अपील की है कि वे ऐसे कट्टरपंथी और अमानवीय कानूनों की मुखालफत करें। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वे ‘सियासी फैसलों’ और ‘कुरआन व सुन्नत की तालीम’ के बीच के फर्क को पहचानें और दीन को बदनाम करने वाली सोच से खुद को अलग रखें।

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