
बोकारो : लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभों-जनप्रतिनिधि और कानून के रक्षकों-के बीच उपजी रार ने पूरे जिले के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। चास नगर निगम चुनाव (वार्ड 32) के दौरान हुए बवाल और एसडीपीओ प्रवीण कुमार सिंह के घायल होने की घटना अब एक बड़े विवाद में तब्दील हो गई है। जहां विधायक श्वेता सिंह ने विधानसभा में पुलिस की ‘बर्बरता’ का मुद्दा उठाया, वहीं पुलिस परिवार के तीनों प्रमुख संगठनों ने विधायक के खिलाफ युद्ध स्तर पर मोर्चा खोल दिया है।
सेक्टर-4 स्थित पुलिस क्लब में आयोजित एक संयुक्त प्रेसवार्ता में पुलिस एसोसिएशन, पुलिस मेन्स एसोसिएशन और चतुर्थवर्गीय कर्मचारी संघ ने विधायक श्वेता सिंह के खिलाफ तीखा आक्रोश व्यक्त किया।
संगठनों का आरोप है कि विधायक ने न केवल वर्दी की गरिमा को तार-तार किया, बल्कि पुलिसिया ‘मर्दानगी’ पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी कर मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। पुलिस ने याद दिलाया कि 23 फरवरी को ड्यूटी के दौरान एसडीपीओ की नाक की हड्डी टूट गई और वे लहूलुहान हो गए, लेकिन विधायक को आरोपी की फटी शर्ट में ‘नाटक’ नजर आ रहा है। पुलिसकर्मियों ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि वे कड़ाके की ठंड और लू के थपेड़ों के बीच विधायक और उनके परिवार की सुरक्षा में 24 घंटे तैनात रहते हैं। उसका बदला ये मिल रहा है। प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि विधायक ने पुलिस की कार्रवाई को व्यक्तिगत रिश्तों (दामाद, मामा, फूफा) से जोड़कर पुलिस का उपहास उड़ाया है। वर्दी को न्यायालय तक घसीटने और पुलिस के पौरुष को चुनौती देने वाले बयानों को पुलिस परिवार ने ‘हृदय विदारक’ बताया है।
बोकारो एसपी हरविंदर सिंह के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए पुलिस संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब अपमान का घूंट पीकर चुप नहीं बैठेंगे। विधायक श्वेता सिंह अपने द्वारा कहे गए अभद्र शब्दों को वापस लें और सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकार करें। यदि पुलिस की गरिमा बहाल नहीं की गई, तो संगठन उग्र आंदोलन और कानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होंगे।
इस मोर्चे का नेतृत्व चतुर्थवर्गीय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष राजेंद्र महतो, मेन्स एसोसिएशन के मंत्री सुभाष शुक्ला, अध्यक्ष संजीत कुमार महतो, पुलिस एसोसिएशन के मंत्री अनिल सिंह और अध्यक्ष सुनील उरांव ने किया। साथ ही नौशाद अली और मनोज कृष्ण दास सहित सैकड़ों पुलिसकर्मी इस दौरान एकजुट दिखे।
यह विवाद अब केवल एक चुनावी झड़प नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘अस्मिता’ की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ जनप्रतिनिधि के अधिकार हैं, तो दूसरी तरफ अपनी गरिमा के लिए अड़ी हुई ‘खाकी’। देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व इस गतिरोध को कैसे सुलझाता है।
Great work . Bokaro, Jharkhand.