
पटना : यूपी में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव परिवार और तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी डीएमके में करुणानिधि परिवार के बाद अब लालू प्रसाद यादव का परिवारवाद एक राजनीतिक मजबूरी की तरह खुल कर सामने आ गया है।
भारतीय जनता पार्टी में नितिन नवीन जैसे अपेक्षाकृत सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले नेता के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में घोषणा के बाद राष्ट्रीय जनता दल में आखिरकार तेजस्वी यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिए जाने के बाद क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद के मुद्दे पर उंगलियां उठ रही हैं। राजद का यह फैसला राजद के भीतर के आंतरिक लोकतंत्र और संगठनात्मक ढांचे को नंगा करता है। यहां दिखता है कि पार्टी का नेतृत्व मिल जाना एक परिवार की विरासत है कोई राजनीतिक कौशल का परिणाम नहीं। साथ ही यह भी कि यह पार्टी कार्यकर्ताओं की पसंद नहीं, बल्कि एक मजबूरी है।
तेजस्वी यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला उनके पिता और पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी में हुआ। तेजस्वी की ताजपोशी भी पिता लालू प्रसाद यादव के कर कमलों से ही सम्पन्न हुआ। यह कुछ आश्चर्य करने वाला नहीं था, बल्कि इसी की उम्मीद की जा रही थी। यह वही पुरानी कहानी थी जिसमें सत्ता, संगठन और उत्तराधिकार एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमट जाया करता है। आखिर क्षेत्रीय पार्टियां परिवारवाद से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहीं, अब यह सवाल पूछने की भी जरूरत नहीं है। राजनीति के ऐसे पुरोधा लोग पार्टी की आंतरिक राजनीति में कोई भी दूसरा मजबूत चेहरा सामने नहीं आने देते। यही कारण है कि पार्टी में पारिवारिक उत्तराधिकारी ही सबसे करिश्माई नेता जान पड़ता है।
सभी मानकर ही चल रहे थे कि लालू प्रसाद के कमजोर स्वास्थ्य और सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद सिर्फ यही होना था कि तेजस्वी यादव ही पार्टी संभालेंगे। इस पार्टी की हकीकत ही यही है कि पार्टी संगठन, रणनीति और पहचान वर्षों से लालू परिवार के नाम पर टिकी है, ऐसे में तेजस्वी यादव की ताजपोशी, उनका कार्यकारी राष्ट्रीय बनाया जाना सिर्फ एक औपचारिकता भर ही थी। ऐसे में भाजपा सहित अन्य विरोधियों का सवाल उठाना तो बनता है। लेकिन राजनीति में यह ऐसी मजबूरी है जिसके सिवा लालू यादव परिवार के सामने कोई विकल्प भी नहीं। आखिर पार्टी को किसके भरोसे छोड़ा जाए। पार्टी की कमान संभालने वाले पर भी तो कमान हो। अब दुनिया चाहे जो कहे।