नई दिल्ली : भारतीय संसदीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहा गतिरोध अब एक बड़े संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ गया है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की औपचारिक शुरुआत कर दी है। इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में विपक्ष ने एकजुट होकर लोकसभा सचिवालय को इस संबंध में औपचारिक नोटिस सौंप दिया है। लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा के नियम 94(सी) के तहत लाया गया है, जिस पर कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों के 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। लोकसभा सचिवालय ने नोटिस मिलने की पुष्टि की है और अब नियमों के तहत इसकी जांच की जाएगी। इससे पहले मंगलवार सुबह संसद परिसर में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कक्ष में विपक्षी दलों की अहम बैठक हुई थी। बैठक में तृणमूल कांग्रेस, वाम दल, डीएमके, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिव सेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट) सहित कई दलों के नेता शामिल हुए। बैठक में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई। विपक्ष ने स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोलने के पीछे कई गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। कांग्रेस ने सदन में महिला सांसदों के साथ कथित तौर पर हुए अनुचित व्यवहार का मुद्दा भी उठाया है। विपक्ष का दावा है कि सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी नेताओं की आवाज दबाई जा रही है, जबकि सत्ता पक्ष को विशेष रियायत मिल रही है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस कदम को बेअसर करार देते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस प्रस्ताव का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि विपक्ष के पास बहुमत नहीं है। रिजिजू ने आरोप लगाया कि विपक्ष सदन में अनुशासनहीनता फैला रहा है और स्पीकर जैसे गरिमामय पद का अपमान कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में यह केवल चौथा अवसर है जब किसी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। इससे पहले 1954, 1966 और 1987 में भी ऐसे प्रयास हुए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। अनुच्छेद 94 के अनुसार, स्पीकर को हटाने के लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस और सदन में 'प्रभावी बहुमत' की आवश्यकता होती है। अब देखना है कि इस अविश्वास प्रस्ताव के क्या मायने निकाल कर आते हैं। क्योंकि सबको पता है कि विपक्ष के पास बहुमत नहीं है, तो क्या यह मात्र विरोध दर्ज करने का हथकंडा मात्र है?

नई दिल्ली : भारतीय संसदीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहा गतिरोध अब एक बड़े संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ गया है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की औपचारिक शुरुआत कर दी है।

इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में विपक्ष ने एकजुट होकर लोकसभा सचिवालय को इस संबंध में औपचारिक नोटिस सौंप दिया है।  लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा के नियम 94(सी) के तहत लाया गया है, जिस पर कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों के 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। लोकसभा सचिवालय ने नोटिस मिलने की पुष्टि की है और अब नियमों के तहत इसकी जांच की जाएगी।

इससे पहले मंगलवार सुबह संसद परिसर में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कक्ष में विपक्षी दलों की अहम बैठक हुई थी। बैठक में तृणमूल कांग्रेस, वाम दल, डीएमके, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिव सेना  (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट) सहित कई दलों के नेता शामिल हुए। बैठक में स्पीकर के खिलाफ   अविश्वास प्रस्ताव लाने और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।

विपक्ष ने स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोलने के पीछे कई गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

कांग्रेस ने सदन में महिला सांसदों के साथ कथित तौर पर हुए अनुचित व्यवहार का मुद्दा भी उठाया है। विपक्ष का दावा है कि सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी नेताओं की आवाज दबाई जा रही है, जबकि सत्ता पक्ष को विशेष रियायत मिल रही है।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस कदम को बेअसर करार देते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस प्रस्ताव का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि विपक्ष के पास बहुमत नहीं है। रिजिजू ने आरोप लगाया कि विपक्ष सदन में अनुशासनहीनता फैला रहा है और स्पीकर जैसे गरिमामय पद का अपमान कर रहा है।

भारतीय लोकतंत्र में यह केवल चौथा अवसर है जब किसी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। इससे पहले 1954, 1966 और 1987 में भी ऐसे प्रयास हुए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। अनुच्छेद 94 के अनुसार, स्पीकर को हटाने के लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस और सदन में ‘प्रभावी बहुमत’ की आवश्यकता होती है। अब देखना है कि इस अविश्वास प्रस्ताव के क्या मायने निकाल कर आते हैं। क्योंकि सबको पता है कि विपक्ष के पास बहुमत नहीं है, तो क्या यह मात्र विरोध दर्ज करने का हथकंडा मात्र है?  

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